Sunday, November 25, 2018

करतारपुर साहिब कॉरिडोर पर क्यों बेचैन हैं डेरा बाबा नानक के लोग

पाकिस्तान की सरहद से 100 मीटर की दूरी पर पंजाब के गुरदासपुर का डेरा बाबा नानक.

ये वो जगह है, जहां जल्द ही पाकिस्तान के करतारपुर साहिब गुरुद्वारा जाने वाले यात्रियों के लिए कॉरिडोर बनाया जाएगा.

एक कार्यक्रम में इस कॉरिडोर की नींव का पत्थर रखा जाएगा.

सोमवार को इस कार्यक्रम में उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू और पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह शरीक होंगे.

ऐसे में डेरा बाबा नानक में 20-25 लोग आयोजन की तैयारियों में जुटे हुए हैं. इलाके में भारी पुलिस बल की भी तैनाती की गई है.

क्यों अहम है ये जगह?
सोमवार को होने वाले कार्यक्रम को भारत और पाकिस्तान के रिश्तों के लिए अहम माना जा रहा है.

28 नवंबर को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान भी सरहद पार कॉरिडोर की नींव रखेंगे. करतारपुर साहिब पाकिस्तान में आता है लेकिन इसकी भारत से दूरी महज़ साढ़े चार किलोमीटर है.

अब तक कुछ श्रद्धालु दूरबीन से करतारपुर साहिब के दर्शन करते रहे हैं. ये काम बीएसएफ की निगरानी में होता है.

मान्यताओं के मुताबिक़, सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक 1522 में करतारपुर आए थे. उन्होंने अपनी ज़िंदगी के आख़िरी 18 साल यहीं गुज़ारे थे.

माना जाता है कि करतारपुर में जिस जगह गुरु नानक देव की मौत हुई थी वहां पर गुरुद्वारा बनाया गया था.

70 साल बाद खुला गुरुद्वारा
क्या है स्थानीय लोगों की चिंता
अब जब दोनों देशों ने करतारपुर साहिब में कॉरिडोर बनाने की पहल हो रही है, तब स्थानीय लोगों के बीच थोड़ी चिंता ज़रूर है.

इसकी वजह इलाके में अचानक सुरक्षाबलों और आने वाले लोगों की भीड़ का बढ़ना है.

बीएसएफ के एक अधिकारी ने बताया, ''अभी तक जो जानकारी मिली हैं, वो अधूरी हैं. हम नहीं जानते हैं कि कैसा कॉरिडोर बनेगा और किस तरफ़ बनेगा.''

Wednesday, November 7, 2018

अब कैसी है ऋषि कपूर की तबीयत? बेटी रिद्धिमा ने दिया हेल्थ अपडेट

न दिनों ऋषि कपूर न्यूयॉर्क में मेडिकल ट्रीटमेंट ले रहे हैं. एक्टर की बीमारी को लेकर तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं. अब उनकी  बेटी रिद्धिमा कपूर ने पिता की सेहत से जुड़ा अपडेट दिया है.

एक अखबार से हुई बातचीत में रिद्धिमा ने कहा, ''वे बिल्कुल ठीक हैं. चिंता करने की कोई बात नहीं है. वैसे मैं कभी उनके स्वास्थ्य के लिए चिंतित नहीं थी. वे बस अपना रुटीन टेस्ट करा रहे हैं, जैसा कि उन्होंने ट्विटर पर कहा था. वे कई सालों के बाद अपने सारे ट्रीटमेंट करा रहे हैं. हमें उम्मीद है कि सब कुछ ठीक होगा.''

बता दें, न्यूयॉर्क में ऋषि के साथ नीतू कपूर और रणबीर कपूर हैं. एक्टर से मिलने और उनकी सेहत का हाल लेने कई बॉलीवुड सेलेब्स आते रहते हैं. पिछले दिनों प्रियंका चोपड़ा, अनुपम खेर, जावेद अख्तर, आलिया भट्ट और सोनाली बेंद्रे उनसे मिलने पहुंचे थे.

मालूम हो कि मेडिकल ट्रीटमेंट की वजह से ऋषि अपनी मां कृष्णा राज कपूर के अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो पाए थे. ऐसा भी कहा गया कि उन्हें तीसरी स्टेज का कैंसर डिटेक्ट हुआ है. लेकिन रणधीर ने ऋषि कपूर की हेल्थ को लेकर चल रही तमाम अटकलों को खारिज किया था.

ऋषि कपूर के वर्क फ्रंट की बात करें तो उनकी अगली फिल्म राजमा चावल है. जिसे लीना यादव ने डायरेक्ट किया है.

इस दौरान पीएम मोदी ने जहां जवानों के शौर्य को सलाम किया, वहीं ये भी कहा कि सभी की तरह वह भी परिवार के साथ दिवाली मनाने की चाहत रखते हैं और सभी जवान उनके परिवार की तरह हैं.

वहीं 2016 की दिवाली भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय सैनिकों के साथ मनाई. इस दौरान वो हिमाचल प्रदेश में चीन की सीमा के पास रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इलाके में सैनिकों के बीच पहुंचे थे. साथ ही पीएम बिना किसी पूर्व कार्यक्रम चांगो नाम के एक गांव में भी गए और कहा कि लोगों के आतिथ्य सत्कार और उनकी खुशी ने उन्हें अभिभूत कर दिया. इसके अलावा पीएम मोदी ने यहां सुमोध नाम की जगह पर इंडो-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी), डोगरा स्काउट्स और सेना के जवानों से मुलाकात की.

प्रधानमंत्री कार्यकाल के दूसरी दिवाली के अवसर नरेंद्र मोदी अमृतसर स्थित डोगराई युद्ध स्मारक पहुंचे, जो सबसे कठिन युद्ध स्थल के रूप में जाना जाता है. इस जगह भारतीय सैनिकों ने 22 सितंबर, 1965 को जीत प्राप्त की थी. पीएम मोदी ने यहां जवानों के साथ दिवाली का पर्व मनाया और सैनिकों से कहा कि लोग अपने परिवार के सदस्यों और प्रियजनों के साथ दिवाली मनाते हैं, मैं भी आपके साथ दिवाली मनाने आया हूं.

मई 2014 में केंद्र की गद्दी संभालने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कुछ महीनों बाद ही अक्टूबर में दिवाली मनाने सियाचिन पहुंच गए. यहां उन्होंने जवानों के साथ पर्व मनाया और उनके बीच मिठाइयां भी बांटी.

Monday, November 5, 2018

ईरान की घर ठंडा रखने वाली हज़ारों साल पुरानी तकनीक बादगीर

ईरान के यज़्द शहर के रहने वाले साबेरी कहते हैं कि 'मेरे यहां पानी वाले एयर कंडिशनर भी हैं. मगर मुझे यहां, इस क़ुदरती एसी में बैठना पसंद है. ये मुझे पुराने दिनों की याद दिलाता है.'

साबेरी का इशारा बादगीर (हवा पकड़ने वाला) की तरफ़ है. हम उसी के साये तले बैठे हैं.

रेगिस्तान में बसे यज़्द शहर में भयंकर गर्मी पड़ती है. पारा 40 डिग्री सेल्सियस के पार चला जाता है.

इतने गर्म मौसम में चाय का ख़याल आना अजूबा ही होगा.

लेकिन बादगीर के हवादार आंगन में बैठने के बाद तपता सूरज भी मद्धम जान पड़ता है.

इतना आराम मिलता है कि अपने मेज़बान को अलविदा कहने का मन नहीं होता.

यहां बैठ कर आप जब आस-पास की चीज़ों को निहारते हैं, तब एहसास होता है कि इंसान ने इस गर्म माहौल में ख़ुद को सुकून देने की ये तकनीक हज़ारों बरस पहले ही ईजाद कर ली थी.

ईरान के हज़ारों साल पुराने एसी
बादगीर यानी हवा पकड़ने वाले ये ढांचे चिमनी जैसे हैं, जो यज़्द और ईरान के रेगिस्तानी शहरों की पुरानी इमारतों के ऊपर दिखते हैं.

ये ठंडी हवा को पकड़ कर इमारत में नीचे की तरफ़ ले जाने का काम करते हैं. इनकी मदद से मकानों को भी ठंडा किया जाता है.

और उन चीज़ों को बचाने का काम भी होता है, जो गर्मी में ख़राब हो सकती हैं.

तमाम रिसर्च से साबित हुआ है कि बादगीर की मदद से तापमान को दस डिग्री सेल्सियस तक घटाया जा सकता है.

प्राचीन काल में फ़ारस से लेकर, मिस्र, अरब और बेबीलोन की सभ्यताओं तक, ऐसे आर्किटेक्चर को बनाने की कोशिश की गई जो मौसम की मार से बचा सके.

ऐसे ज़्यादाचर ढांचों को क़ुदरती तौर पर हवादार बनाने की कोशिश की गई.

बादगीरों या हवादार ढांचों की ऐसी मिसालें मध्य-पूर्व से लेकर मिस्र और भारत-पाकिस्तान तक देखी जा सकती हैं.

कैसे बनाए जाते हैं ये बादगीर
बादगीर, इमारतों के सबसे ऊंचे हिस्से में बने होते हैं. इसलिए इनकी देख-रेख बड़ी चुनौती होती है.

इनकी टूट-फूट का ख़तरा ज़्यादा होता है. ईरान की कई इमारतों के ऊपर बने ये ढांचे यानी बादगीर चौदहवीं सदी तक पुराने हैं.

फ़ारसी कवि नासिर ख़ुसरो की नज़्मों में भी बादगीर का ज़िक्र मिलता है. ये नज़्में तो डेढ़ हज़ार साल पुरानी हैं.

वहीं, मिस्र के लक्सर शहर में ईसा से 1300 साल पुरानी कुछ पेंटिंग मिली हैं.

इन चित्रों में भी बादगीर जैसी संरचनाएं देखने को मिलती हैं.

डॉक्टर अब्दुल मोनिम अल-शोरबागी सऊदी अरब के जेद्दा स्थित इफ़त यूनिवर्सिटी में आर्किटेक्चर और डिज़ाइन के प्रोफ़ेसर हैं.

डॉक्टर शोरबागी कहते हैं कि मध्य-पूर्व के देशों से लेकर, पाकिस्तान और सऊदी अरब तक बादगीर मिलते हैं.

ये इराक़ के अब्बासी ख़लीफ़ाओं के दौर के महलों की चौकोर इमारतों से मिलते-जुलते हैं.

ये महल इराक़ के उखैदर इलाक़े में आठवीं सदी में बनाए गए थे.

वैसे एक थ्योरी ये भी है कि बादगीर का विकास अरब देशों में हुआ. जब अरबों ने ईरान पर जीत हासिल की, तो उनके साथ ये फ़ारस भी पहुंचा.

यज़्द शहर की ज़्यादातर इमारतों पर बने ये बादगीर आयताकार हैं. चारों तरफ़ हवा आने के लिए खांचे बने हुए हैं.

लेकिन स्थानीय लोग बताते हैं कि छह और आठ मुंह वाले बादगीर भी मिलते हैं.

यज़्द की पुरानी इमारत में चलने वाले एक कैफ़े के कर्मचारी मोइन कहते हैं कि, 'बादगीर में हर दिशा से आने वाली हवा पकड़ने के लिए खांचे बने होते हैं. जबकि यज़्द से कुछ दूर स्थित क़स्बे मेबूद में सिर्फ़ एक तरफ़ खांचे वाले बादगीर मिलते हैं क्योंकि वहां तो एक ही तरफ़ से हवा आती है.'

बादगीर के ढांचे को ऐसे बनाया गया है जो वातावरण की हवा को खींचकर संकरे रास्तों से होते हुए नीचे की तरफ़ ले जाता है.

ठंडी हवा के दबाव से गर्म हवा इमारत के बाहर निकल जाती है.

इस हवा के निकलने के लिए बादगीर के उल्टी तरफ़ एक खिड़की जैसी जगह खोली जाती थी.

अगर ठंडी हवा नहीं भी बह रही होती, तो भी बादगीर गर्म हवा पर दबाव बनाकर उसे धकेल कर घर से बाहर निकालने का काम करता था.

इससे घर के भीतर ठंडक बनी रहती थी.

सर्दी और गर्मी वाले घर
यज़्द शहर में क़जारी युग के कई मकान अब भी अच्छी हालत में हैं.

इन्हीं में से एक है मशहूर लारिहा हाउस. उन्नीसवीं सदी में बनी ये इमारत फ़ारसी आर्किटेक्चर का शानदार नमूना है.

इसके बीचो-बीच आयताकार आंगन है. इमारत में गर्मी और सर्दी के मौसम के हिसाब से अलग-अलग हिस्से बने हैं.

इमारत को दो हिस्सों में बांटने का मक़सद है सर्दी में सूरज की गर्मी का ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल और गर्मी में सूरज से दूरी.